Sunday, 24 July 2016

उलझता सुलझता मैं

उलझता सुलझता मैं,पता नही क्या ढूंढ़ता
पर है कुछ जो लगता है की खाली हूँ अभी
सोंचता मैं, चाहता कुछ पाना मैं
पर लगता शायद ऐसे ही रह जायेगा सब
उम्मीद और आशाएं भी नही लगती
तो फिर क्यों बैठा और किस इंतज़ार में
कुछ है ओ छुटता नही,है कुछ रुका थमा
इसी उलझन में घसीटता और लिपटता मैं
उलझता सुलझता मैं,पता नही क्या ढूंढ़ता !!


- धीरज कुमार मिश्रा