अगर आप टेलीविजन ये सोच कर देखना चाहते हैं कि चलो दिनभर का समाचार ले लेते तो आप बहुत बड़ी गलती कर रहे है इससे अच्छा होगा कि आप बाहर कहीं टहल आयें. जी हान सच कह रहे है क्योंकि ना जाने किस एंकर या नेता कि उँगली आप कि ओर आ जाए और पुंछ दे कि आप किसे "वोट दे रहें हैं".
जब से चुनावों कि घोषणा हुई है तब से बस यही आ रहा है...कोई सब के पास जाकर समझा और पुंछ रहा है और कोई अपने पास बुला कर.
कहीं कोई होली खेल रहा है और कोई गोली दे रहा है. जैसे ही इलेक्शन आते है तो तू-तू..मै-मै चालू हो जाती है. अब सारे मुद्दे आ जाते है. अगर नही भी है तो प्रशिद्ध दंगों वाले मुद्दे तो हैं ही. और तो और न्यूज़ चैनल वाले तो नेताओं क अनुसार ही कर रहे है ऐसा लगता है.
कोई चैनल गुजरात 2002 दिखा रहा तो कोई 1992 अयोध्या और कोई 1984 सिख. पूरा इतिहास अपनी-अपनी कलम से पता नही किसका एस्सऐ कितना सही है. ये सब भी कुछ ही दिन के लिए..एक बार चुनाव होने दीजिये फिर देखिये कौन से मुद्दे कौन से दंगे
किसी को क्या फर्क पड़ता है. इंडिया शाइनिंग हो या वुमन ईम्पावरमेंट. कुछ भी हो आप चाय तो आप अपने घर कि ही पियेंगे..सस्ती हो या महँगी...
तो बात मनिये बाहर ही रहिये या जवाब दिजिये ----- ""तो आप किसे वोट दे रहें है?? """
शुभ रात्रि :)
धीरज मिश्रा
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