फिर लुट रहा देश चहुं ओर से
अब है हीं लुटेरे खुद अपने देश के
अब किसे कहें चल भाग
निकल खाली कर तू देश
खुद अपने ही लगे हैं धन उगाही मे
और कट रहे गला खून अपनों का
क्या यही सोच शीस कटवाए थे वीरों ने
जिस खादी को चरखे पर रख कर
एक-एक धागा पिरोया गाँधी ने
वही खादी पहन कर रहे
देश तार - तार अब
करें भिन्न -भिन्न घोटाले
और थप थापएं अपनी अपनी पीठ
2G हो या चारा घोटाला
कोयला से लेकर राष्ट्र मंडल खेल घोटाला
हर छेत्र में अपने को फैलाया है
और देश को लूट कर
देश को सताया है
क्या सोच लडे थे हमारे वीर ?
क्या यही सोच थी आजाद -भगत -शुभाष की ?
क्या इसीलिए देश आजाद कराया था ?
की अब हम खुद लूटेंगे
हर दिन लग रहे आरोप प्रत्यारोप
अक दुसरे की गीरेबन खींच रहे हैं
हर कोई लगा है अपनी मनमानी मे
देश चलने वाले अब
देश चरा रहे हैं !!!
हर समय मै यही सोचता की
किस ओर जा रहा देश अपना ??
धीरज मिश्रा :)
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